सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद अनुसूचित जातियों के बीच भाजपा का 'स्वाभिमान सम्मेलन'




सिद्धांत मोहन, TwoCircles.net

वाराणसी : भले ही सर्वोच्च न्यायालय ने राजनीतिक दलों द्वारा जाति और धर्म के नाम पर वोट मांगने को अवैध करार दे दिया हो, लेकिन भारतीय जनता पार्टी का हालिया कैम्पेन इस आदेश को आड़े हाथों लेता नज़र आ रहा है.

उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र भारतीय जनता पार्टी प्रदेश के कई क्षेत्रों में अनुसूचित जातियों के साथ स्वाभिमान सम्मेलन का आयोजन कर रही है.

सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से चालाकी से बाई-पास करने के लिए भाजपा के प्रवक्ता यह कहते फिर रहे हैं कि यह सम्मेलन पार्टी के पिछड़ी जाति के कार्यकर्ताओं के उत्साहवर्धन के लिया किया जा रहा है.

ज्ञात हो कि आगामी दस जनवरी से इस स्वाभिमान सम्मेलन का आयोजन होगा. काशी क्षेत्र - जिसमें नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र वाराणसी शामिल है - में भी दस जनवरी से सोलह जनवरी तक इस स्वाभिमान सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है. काशी क्षेत्र में वाराणसी, विन्ध्याचल और इलाहाबाद में एक-एकदिवसीय सम्मेलन किए जाएंगे.

भाजपा के काशी क्षेत्र के अध्यक्ष लक्ष्मण आचार्य ने हमसे बातचीत में कहा, 'ऐसा नहीं है कि इस आयोजन के बाबत हम सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना कर रहे हैं. यह भारतीय जनता पार्टी का पुराना आयोजन है और इसके ज़रिए हम पिछड़ी जातियों या अनुसूचित जातियों के उत्थान का कार्य करेंगे. हम उन्हें केंद्र सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं के बारे में जानकारी देंगे.'

लक्ष्मण आचार्य साफ़ तौर से इस आयोजन की किसी राजनीतिक पृष्ठभूमि से इनकार करते हैं, लेकिन दूसरे पदाधिकारियों से बात करने पर यह बात सामने आ जाती है कि पार्टी इस आयोजन के मूल उद्देश्य को लेकर दुविधा में है और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना हो रही है.

काशी क्षेत्र के ही प्रवक्ता संजय भारद्वाज कहते हैं कि पार्टी इस आयोजन के ज़रिए वोटरों तक नहीं, बल्कि पार्टी के पिछड़े कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों तक पहुंचना चाहती है. संजय भारद्वाज कहते हैं, 'पार्टी का उद्देश्य है कि वह पार्टी के पिछड़ी जाति से जुड़े कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों को आगामी चुनाव को लेकर प्रोत्साहित करे. हम वोटरों या आम जनता के स्तर पर इसका कोई लाभ नहीं उठाना चाहते हैं.'

यह पूछने पर कि क्या भारतीय जनता पार्टी में पिछड़ी जाति के कार्यकर्ताओं को अलग से संबोधित और प्रोत्साहित करने की परम्परा है, कोई पदाधिकारी स्पष्ट जवाब देने में असफल साबित होता है.

ज्ञात हो कि इस सोमवार को दिए अपने ऐतिहासिक फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने धर्म, जाति, सम्प्रदाय, समुदाय और भाषा के आधार पर वोट मांगने को अनैतिक और गैर-कानूनी करार दे दिया. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि यदि कोई प्रत्याशी ऐसा करता पाया जाता है कि तो उसका नामांकन रद्द माना जाएगा.